अनुच्छेद 48a – पर्यावरण का संरक्षण और वन्यजीवों की रक्षा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48a के तहत राज्य को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह देश के पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करे, साथ ही वनों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए प्रयासरत रहे।

TD Desk

अनुच्छेद 48a (Article 48A in Hindi) – पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा।

राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

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व्याख्या

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48क के तहत राज्य को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह देश के पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करे, साथ ही वनों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए प्रयासरत रहे। यह अनुच्छेद 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से जोड़ा गया, जिससे पर्यावरण संरक्षण को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व बनाया गया।

अनुच्छेद 48a के तहत मुख्य बिंदु:

  1. पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन: राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश का पर्यावरण स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित बना रहे। इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण, प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग और हरित उपाय अपनाना आवश्यक है।
  2. वन और वन्यजीवों की रक्षा: वनों की कटाई को रोकने, वन क्षेत्र बढ़ाने और वन्यजीव संरक्षण के लिए राज्य को सक्रिय कदम उठाने चाहिए। यह जैव विविधता को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

अनुच्छेद 48क का महत्व:

  1. पर्यावरणीय संतुलन: यह अनुच्छेद प्रकृति और पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राज्य को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश देता है।
  2. प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा: जल, वायु, भूमि और वन जैसे संसाधनों की रक्षा करना भविष्य की पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।
  3. वन्यजीवों का संरक्षण: वन्यजीव जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और उनकी रक्षा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है।

संविधान संशोधन का प्रभाव:

42वें संशोधन अधिनियम, 1976 ने पर्यावरण संरक्षण को न केवल नीति निर्देशक तत्व के रूप में रखा, बल्कि इसे नागरिकों का मौलिक कर्तव्य भी बनाया।

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  • अनुच्छेद 51क (g): प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन करे।

पर्यावरण संरक्षण से संबंधित कानून:

भारत में पर्यावरण की रक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिए यह प्रमुख कानून है।
  2. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: इस अधिनियम का उद्देश्य वन्यजीवों की प्रजातियों की रक्षा करना और उनके आवासों को संरक्षित करना है।
  3. भारतीय वन अधिनियम, 1927: वनों की सुरक्षा और उनके उपयोग के प्रबंधन के लिए यह अधिनियम लागू है।
  4. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981: वायु प्रदूषण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए।
  5. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974: जल संसाधनों की रक्षा और प्रदूषण नियंत्रण के लिए।

सरकार की पहल:

  1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT): पर्यावरण से जुड़े मामलों का निपटारा करने के लिए विशेष न्यायाधिकरण।
  2. राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (2006): सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति।
  3. अभियान और योजनाएं: ‘स्वच्छ भारत अभियान’, ‘हरित भारत अभियान’, ‘वन महोत्सव’, आदि।

चुनौतियां:

  1. अवैध कटाई और शिकार: वन्यजीवों और वनों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।
  2. औद्योगिक प्रदूषण: औद्योगीकरण और शहरीकरण से वायु, जल और भूमि प्रदूषण बढ़ रहा है।
  3. जन जागरूकता की कमी: पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

अनुच्छेद 48a का उद्देश्य है कि सरकार पर्यावरण, वन, और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए काम करे। यह वनों को नष्ट होने से बचाने, जैव विविधता को सुरक्षित रखने, और प्रदूषण कम करने के प्रयासों पर जोर देता है।

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Source : – भारत का संविधान

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