अनुच्छेद 36 –  राज्य निति-निर्देशक तत्व – परिभाषा

अनुच्छेद 36, के अन्तर्गत राज्य के परिभाषा का वर्णन है। राज्य का मतलब सविंधान के अंतर्गत स्वतंत्र निकाय से न की देश की राज्यों से।

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अनुच्छेद 36 (Article 36 in Hindi) –  राज्य निति-निर्देशक तत्व – परिभाषा

इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, ‘राज्य’ का वही अर्थ है जो भाग 3 में है।

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व्याख्या

अनुच्छेद 36, के अन्तर्गत राज्य के परिभाषा का वर्णन है। राज्य का मतलब सविंधान के अंतर्गत स्वतंत्र निकाय से न की देश की राज्यों से।

  • इसे आयरलैंड से लिया गया है।
  • यह शासन व्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
  • यह कल्याणकारी तथा आर्थिक लोकतंत्र के लिए है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इन तत्व को ‘विशेषता’ वाला बताया है। मूल अधिकारों के साथ निदेशक तत्व, संविधान की आत्मा एवं दर्शन हैं। ग्रेनविल ऑस्टिन ने निदेशक तत्व और अधिकारों को ‘संविधान की मूल आत्मा कहा है।

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नीति निदेशक तत्वों की विशेषताएं

  1. राज्य की नीति के निदेशक तत्व, नामक इस उक्ति से यह स्पष्ट होता है कि नीतियों एवं कानूनों को प्रभावी बनाते समय राज्य इन तत्वों को ध्यान में रखेगा।
  2. निदेशक तत्व भारत शासन अधिनियम, 1935 में उल्लिखित अनुदेशों के समान हैं।
  3. आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में आर्थिक, सामाजिक और राजनीति विषयों में निदेशक तत्व महत्वपूर्ण हैं। इनका उद्देश्य न्याय में उच्च आदर्श, स्वतंत्रता, समानता बनाए रखना है।
  4. निदेशक तत्वों की प्रकृति गैर-न्यायोचित है। यानी कि उनके हनन पर उन्हें न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। अतः सरकार (केंद्र राज्य एवं स्थानीय) इन्हें लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
  5. यद्यपि इनकी प्रकृति गैर-न्यायोचित है तथापि कानून की संवैधानिक मान्यता के विवरण में न्यायालय इन्हें देखता है।

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Source : – भारत का संविधान

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